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आम का मौसम खट्टे मीठे स्वाद से भर पूर आम का मौसम जाने को है पर मौसम कोई भी आम का नाम आते ही मुंह में पानी आ जाता है। मगर आम का मौसम जारहा है तो क्या हुआ आएगा जरुर वापिस। इसलिए तो हम बता रहे है कैसे करे आम की खेती और आम की बागवानी।आम की खेती के लिए यही मोसम सही होता जब आम के फल ख़म होते है तो आम के पौधे लगाने का समय शुरू होता है वैसे तो आम स्वाद का बखान हमारे देश में नही बल्कि विदेशो में भी है।आम भले ही हिन्दुस्तानी फल है मगर विदेश में इसकी अच्छी मांग है होगी भी क्यों नही फलो का raaja जो है ।भारत का खास फल होना होना हो इसका बेह्तिरीन स्वाद वजह कोई भी गर्मी के मौसम में ये हर हिन्दुस्तानी की थाली की शोभा है इस मौसम में हर घर में आम जरुर मिलेगा।ग्रंथो से लेकर पुराणों तक हर जगह इसकी गुण का बखान मिलता है । आम का इतिहास भी कम नही १६७३ में यूरोप यात्री फ्रायर ने आम का स्वाद लिया और कसीदा ही कह डाला की इसने यूरोप के आडू ,खुबानी, सबके स्वाद भुला दिए, बोद्ध जातको में बुद्ध द्वारा अपने प्रशंसक की आमराई में विश्राम करने के बाद जब उन्होंने अपने हाथ धुले और जहाँ जहाँ पानी छिड़का कालान्तर में वहां सफे...
शराब के नशे में धुत होती दुनिया बरबाद होती जिन्दगी तबाह होते घर और बिगड़ते भविष्य ये सब शराब ही कर सकती है ,मगर फिर भी लोग इसे अमृत की तरह पीते है, चाहे वो घर पर होने वाला छोटे दे फंक्शन की बात हो या शादी विवाह हर पार्टी में शराब की रोनक बरक़रार रहती है,शराब और उसका नशा आज हमारे युआ और पार्टी की शान है,आज हर महफिल इसके बिना अधूरी है जहाँ ये लोगो की महफिल की रोनक है वहीँ दूसरी तरफ यह उन्हें गुमराह करने की भी अहम् भूमिका निभाती है अब तो आलम ये हो गया है की इसका लुप्त व्यस्कों और युआ के साथ बच्चे भी उठाने लगे है,उनके परिवार भी उनका पूरी सहयोग करते है यही वजह है की बदलते दौर के साथ चीजो के मायने भी बदलने लगे है ,आज शराब की दुकान हर कस्बेऔर मोहल्ले में देखने को मिल जायेगी ,भले सरकार ने इस पर रोक लगाया हो की शराब की दुकान मन्दिर और स्कूल के पास नही होगी मगर ऐसा कुछ नहीं है ,मन्दिर और स्कूल के पास अभी भी शराब की दुकान मिल जायेगी क्युकी जितनी तादाद में लोग इसका विरोध करने वाले है उससे कहीं जादा तादाद में लोग इसका समर्थन करते है ,कहते है ,दिक्कत क्या है चल रही है तो चलने दो कोई मन्दिर म...
आखिर क्यों? कही शक्ति का अवतार तो कभी ममता का मूरत कही जाने वाली औरत को क्यों हर कदम पर पुरुषों के बुरी दिर्ष्टसे दो चार पड़ता है,आज के दौर में जहाँ युवतिया हर क्षेत्र में अपना पाँव जमा रही है और ख़ुद को साबित भी क्र चुकी है मगर उनकी इतनी तरक्की के बावजूद उन्हें इन समस्या का सामना करना ही पड़ता है ,घर में कभी बेटी तो कहीं बहेन बनकर मां बाप का गौरव बढाती है तो वहीं ससुराल में पति और बच्चो के खुशी के लिए हर दर्द सहने को तत्पर रहती है ,मगर जब यही औरत अपने वाजूद के लिए कुछ करना चाहती है और घर के चार दिवारी से बाहर निकलती है तो समाज के ठेकेदार पुरूष हर मोड़ पर इनका इस्तमाल करने को खड़े मिलते है कभी ये ऑफिस में बॉस प्रमोशन के वजह से प्रताडित होती है तो कही तन्खवाह बढ़ाने के लिए इनका यौन शोषण का सौदा किया जाता है ,क्या पुरुष होने का यही मतलब होता है की अपने समकक्ष खड़ी औरत के दमन को दागदार कर देना,पुरुषो की महानता और वीरता का यही परिचय रह गया है की सड़क पर चलते समय औरतो को छेड़ दिया जाए या उनके कपड़े खीच लिए जाए ताकि वो गिरे और हम उन्हें देख कर मजे ले ये घटनाये सिर्फ़ लड़कियों के साथ ही नही बल्कि उ...
आम आदमी और चुनाव आम आदमी के लिए लोकसभा चुनाव मुसीबत का सबब बनता जा रहा है।रोज होने वाले नामांकन से लोगो को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।नामांकन के होने की वजह से आए दिन सड़के जम हो जाती है।जिससे लोगो को रोजाना कई दिक्कतों से रूबरू होना पड़ता है।जहाँ इस मोसम में सुबह से ही तेज़ धूप से लोग झुलसने लगते है वही इतनी गर्मी में घंटो जम में फसने वाले छोटे छोटे स्कूली बच्चे से लेकर दफ्तर जाने वाले लोगो को घंटो भीड़ छटने का इंतजार करना पड़ता है इतना ही नही सबसे बड़ी मुसीबत उन मरीजो के लिए है जिन्हें उस समय अम्बुलेंसे से ले जाया जाता है उन्हें तक पहुचने में घंटो लग जाता है कभी कभी तो ये जिन्दगी की जंग की जरुरत होती है अस्पताल पहुचने से पहले हार जाते है दफ्तर देर पहुचने पर कर्मचारियों को अपने बॉस की दंत सुन्नी पड़ती है वही देर होने के चक्कर में कभी कभी दुर्घटना भी हो जाती है । लोकसभा चुनाव के महूल में लखनऊ में रोजाना नामांकन हो रहा है।जिसे चलते इतनी भाग भरी जिन्दगी वही थम सी जाती है जहाँ ये नामांकन या जुलुस निकलते है
चुनाव "यु को होति है " उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से दस किलो मीटर दूर गाँव की जनता लोकसभा चुनाव को ग्रामसभा चुनाव समझती है।इस जनता को अपने गाँव की सड़क ,बिजली से मतलब है न की देश में चल रही समस्या से। जहाँ चुनाव महापर्व शुरू होते ही राजनेताओ से लेकर आम इन्सान भी इस पर्व में सम्मलित होता है ।चुनाव आते ही नेता शहर से लेकर गाँवो तक जाना शुरू करते है।अपने प्रचार प्रसार के लिए।फिर शुरू होता है ऐसे वादों और संकल्पों का सिलसिला जो जीतने के बाद बंद भी हो जाता है।ये वादे शहर की जनता के सामने सच भी होते है मगर गाँवो के लोगो के लिए सिर्फ वादा जो कभी नहीं पूरा होता है।ऐसे ही नेताओ के वादे और उस जनता जिसे चुनाव का मतलब ही नहीं पता उनसे बात चीत के कुछ अंश। आप की नज़र में चुनाव क्या है "यु को होति है" ये कहना खदरा निवासी शायरा का।जिसे चुनाव का मतलब ही नहीं पता कुछ समझाने के बाद कहती है "अरे यु जब नेता जी आवे है और कहे है हमका वोट दियो।और बतावे है की "वे हमरे गाँव मा बिजली लगवा दिहे"।यही सवाल जब सरस्वती से पूछा तो कहा है।एक ऐसा महिना जब बड़े लोग हमारे गाँव में आते...
हजारो पिंकी की स्माइल अभी बाकी मुझे आस्कर तभी मिल जाता है जब किसी पिंकी के चेहरे पर मुस्कान आती है ।ये कहना है डॉ सुबोध का जो शुक्रवार दोपहर लखनऊ यू पी प्रेस क्लब के खास मेहमान थे ।डॉ सुबोध के आते ही लोगो का हुजूम इस तरह उनसे मिलने के लिए उमडा मानो कोई सेलेब्रेटी आ गया हो।डॉ सुबोध ने बताया बच्चो का होठ और तालू ७ से १२ सप्ताह के बीच बनता है जब वे माँ के गर्भ में होते है।तालू कटे होने बच्चे माँ का दूध नही पी पाते ऐसे बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते है और अपनी उम्र से १५ साल पहले मर जाते है.होठ कटे बच्चे का आरेशन ३ से ६ माह के बीच और तालू कटे का ९ से १२ माह के बीच हो तो जादा अच्छा होता है।मगर उनका इलाज भी होता है जिनकी उम्र इससे जादा है और जो बूढे हो गए है। अभी भारत में ऐसे ३५ हज़ार नए और दस हज़ार पुराने मरीजों का इलाज हो पा रहा है।जबकि पूरे भारत के बच्चो को इससे छुटकारा दिलाने में अभी १०० साल लग जाएगे।सुबोध ने ये भी कहा ऐसे बच्चे हीनभावना के शिकार भी हो जाते है।इन्हे कोई स्कूल नही भेजता वहां लोग इन्हे चिढाते है और मारते है। क्योकि जागरूकता की कमी है इनके परिवार में और गरीबी भी।डॉ सुबोध ने ...
पत्रकारिता में सावधानी शुक्रवार दोपहर ३ आई.एस.बी.एम् कोलकात्ता के तरफ से जेमिनी कोन्तिमेंटेल हजरतगंज में सेमिनार हुआ।जिसमे इस क्षेत्र के छात्रों को पत्रकारिता के लिए सावधानियों के बारे में बताया गया।जिसके प्रस्तुतकर्ता रेडियो सिटी ,डी.जी.एन.थे।छात्रों के लिए प्रतियोगता भी हुई जिसमे काफी बच्चो ने रेडियो सिटी के टी.शर्ट जीते.जिसमे उपस्थित डॉ.पालीवाल जोकि एक मनोचित्सक है और "कैरिअर न्यूज़ " में भी कार्यरत है।उन्होंने "वाद विवाद " प्रतियोगता "पत्रकारिता में युआ होने चाहिए या नही "जिसपर इन्होने अपने वक्तव्य रखे.आज पत्रकारिता को युआ की जरुरत है ये बेहतर सोच सकते है और ये समाज के लिए कुछ कर सकते है। आई.सी.सी के डिरेक्टरने ने भी कुछ ऐसे संबोधित किया। इन्होने कहा की युआ हमारे देश की नींव है ये ही कुछ कर सकते आज के भारत के लिए,जो की इनके हाथो में ही सुरक्षित है.तो इनकी सहभागिता हर क्षेत्र में जरुरी है। इसके बाद आई.एस .बी.एम् के दिरेक्टेर प्रमोद कुमार इन्होने भी कुछ संदेश दिए इन छात्रों को जो कुछ ये था,इस क्षेत्र के बच्चो को शर्माना नही चहिये और आत्मविश्वास की भ...