वो सुकून वाली नींद

समय इतनी तेज़ी से बदलता है, ऐसा लगता है मानों कल की ही बात है, पापा मेरी नींद के लिए अक्सर फटकार लगाते थे.  बात तब की है जब मैं सुबह नाश्ता करके सो जाती थी. एक घण्टे बाद उठती और फिर थोड़ी देर गप्पे मरती, थोड़ा पढ़ती, तब तक मम्मी दोपहर का खाना बना चुकी होती थीं. मैं थोड़ा बहुत हाँथ बटाकर, फटाफट खाना खाने में जुट जाती थी. अब खाना खाने के बाद इस जुगाड़ में रहती थी की कैसे दोपहर वाली नींद पूरी की जाये। ये दौर तब का है जब पापा को तवे से उतरी घी से सराबोर रोटी थाली में चाहिए होती थी।  खाना चूल्हे पर बनता था और गरमा-गरम थाली में पहुँचता था. ख़ासकर करके घर के मर्दों और मेहमानों के लिए. बाकि महिलाओं का क्या है. वो तो बाद में ही खाती थीं. पापा तब इटावा रहते थे और महीने में दो बार ही आते थे।  इस दौरान मम्मी की पूरी कोशिश होती हम लोगों के अलावा उनकी भी सारी फेवरेट चीज़े बनें। मगर मैं अपने धुन में रहती थी, खाना बनेगा तो सबसे भोग तो मैं ही लगाऊंगी। फिर चाहे वो नाश्ता हो या लंच या डिन्नर। मतलब भाई बहन स्कूल जाते थे।  उनकी स्कूल बस होती थी मगर नाश्ता पहले मैं करती थी।  चार पराठे खाकर ही हिलती थी। पूरी रात पापा जागते हुए सफर तय करते थे और नींद में मैं होती थी। क्योंकि उस समय कैश होता था एटीएम का ज़माना नहीं था। पापा सुबह ही घर आते थे, उस वक़्त मेरा जगना ज़रूरी था। जैसे - तैसे मैं नाश्ते का इंतज़ार करती और मुझे जब जैसे मौका मिलता नींद मार ही लेती थी।  मगर पापा की टाइमिंग परफेक्ट रहती थी जैसे मुझे नींद आती पापा की आवाज़ भी आती, क्योंकि उनको पता था मेरा फेवरेट काम है सोना। मैं बोलती आई पापा ! और पापा का भाषण शुरू हो जाता। कितना सोती हो पीलिया हो जायेगा तो इलाज़ नहीं करायेंगे। ये कोई उम्र है सोने की ? जब देखो सोती ही रहती हो।  ये वो समय नहीं था जब हाँ या न बोलने की ज़रूरत थी।  सिर झुकाकर डांट सुनकर वहां से हटना होता था।  हाँ, मम्मी के पास आकर ज़रूर बोलती थी मम्मी ये बुढ्ढा कितना डांटता है ! और मम्मी कहती जाओ यही लाइन पापा के सामने बोलो(हँसते हुए) ! ये तो मेरे औकात के बाहर की बात थी , क्योंकि पता था पापा की सज़ा में रात में घर के बाहर बैठना पड़ता। पापा को अच्छे से पता था मुझे अंधेरे से बहुत डर लगता है। खैर , दिन में सोना मेरे लिए बड़ा ही मज़ेदार होता था।  अक्सर जब भी दोपहर को सोती थी शाम को उठते वक़्त पता चलता मम्मी रसोई में हैं।  कुछ नाश्ते में बना रही है ! मैं फिर मुँह ढ़ककर सो जाती। जब उठती मम्मी का पेट पकड़ लेती और बोलती मम्मी तुमने ये सब बना लिया? मम्मी डांटती और बोलती समय थोड़ी बैठा रहेगा लेकिन तुमको तो सोने से फुरसत ही नहीं है। खा लो सो लो और मन करे तो पढ़ लो बस.
ये सिलसिला तब चला जब तक मेरी शादी नहीं हुई।  यहां तक पढ़ाई पूरी हुई जब जॉब शुरू की, उस वक़्त भी जल्दी तैयार होकर सो जाती थी।  हर कोई हैरान रहता कि कोई दस मिनट के लिए कैसे सो सकता है।  भाई बहन भी परेशां हो दीदी ऑफिस के लिए देर होगी , मगर मजाल हो जो मैं समय पर न उठूं। मगर अब वैसी वाली नींद नहीं आती है जो तब आती थी।  क्योंकि ये भरोसा था की मम्मी सब संभाल लेगी।  अब अगर देर होगी काम नहीं होगा। ऐसा लगता मानों नींद को है लग गयी, अब दिन क्या रात में भी वो नींद नहीं आती जो इतनी डांट सुनने के बाद भी आ जाती थी.

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Best one

अब तो जागो